स्किल इंडिया का मिशन


'मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने‘स्किल इंडिया’ मिशन की शुरुआत की है। इन तीनों योजनाओं को एक शृंखला की कड़ी माना गया है। यानी डिजिटल सेवाएं सुलभ होंगी तो आम लोग उनके उपयोग में कुशल होंगे और ऐसा हुआ तो मेक इन इंडिया का मकसद पूरा होगा।
लोग डिजिटल सेवाओं के उपयोग में कुशल हों, इसके लिए उनमें तकनीकी कामकाज में कुशल होना चाहिए। यही स्किल इंडिया मिशन का मकसद है।
इसकी शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जिस तरह चीन वैश्विक कारखाना बन गया है, वैसे ही भारत को दुनिया के ‘मानव संसाधन के केंद्र’ के रूप में उभरना चाहिए।
उन्होंने इसे ‘गरीबी के खिलाफ अभियान’ बताया। कहा कि बदलते समय की जरूरतों के मुताबिक कौशल का प्रशिक्षण दे कर हमने अपनी युवा आबादी को निखारा तो भारत दुनिया को 4 से 5 करोड़ सक्षम कर्मी उपलब्ध करा सकता है। प्रधानमंत्री का उद्देश्य प्रशंसनीय है।
इस दिशा में उन्होंने पहल की है, यह भी काबिल-ए-तारीफ है। उनके खास अंदाज के अनुरूप ही यह पहल भी बहुचर्चित ढंग से शुरू हुई।
चूंकि मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया का आरंभ हुए अभी लंबा वक्त नहीं गुजरा है, अतः उनकी प्रगति बारे में कोई राय बनाना अभी जल्दबाजी होगी। मगर एक समान बात अवश्य रेखांकित की जा सकती है। वो यह कि इन तीनों के पीछे चीन का अनुभव एक प्रेरक तत्व के रूप में मौजूद है। मगर यही- यानी चीन के मॉडल को अपनाने का प्रयास- इन परियोजनाओं के सफल होने की राह में बाधक बन सकता है।
चीन 1990 के बाद चमका तो इसलिए कि उसके पहले वहां स्वस्थ एवं शिक्षित मानव संसाधन की पूरी फौज तैयार थी।
भारत में जिन दो क्षेत्रों की आरंभ से उपेक्षा हुई, वे शिक्षा और स्वास्थ्य ही हैं। अतीत की सरकारों ने क्या किया, यह व्यापक विचार-विमर्श का विषय है, लेकिन फ़ौरी सवाल यह है कि मोदी सरकार बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्या पहल कर रही है?
अप्रिय तथ्य यह है कि ये क्षेत्र केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में और पिछड़ गए हैं। जबकि इन बिंदुओं पर सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो उपरोक्त तीनों योजनाओं से भारत को खुशहाल बनाने के सपने को साकार करना कठिन बना रहेगा।

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